Thursday, 20 November 2014

मुझे बेचारा न कहो – बेबस वचपन है

मुझे बेचारा न कहो
शायद मजबूरी मेरी किस्मत की हो-
हाथ बढ़ाकर थामों तो जरा
शायद तस्वीर मेरी भी अच्छी हो-

       जिस वक्त किताब मेरे हाथों में हो
       तब ढ़ो रहा मैं परिवार का बोझ क्यों-
       देखो मेरे भी बचपन को
       कौन समझेगा लड़कपन को-

दुःख नही रोष व्यक्त करता हूँ समाज को
क्यों ढ़ाते हो जुल्म मारकर मेरे हक को-

       नहीं मांगता मैं तुमसे कुछ
       फिर क्यों हरते हो मेरा सुख-
       कौन बताएगा मुझे, कौन दिखाएगा मुझे
       कहां जा रहा हूं मै, कौन समझाएगा मुझे-

वो मंजिल भी कहीं दूर है
पता नहीं किस डगर है
किस नगर है-
जा रहा हूं वस बचपन की डगर

थामे हाथों में कमजोर सी डोर
चल रहा हूं बस अपनी मंजिल की ओर-


              -आपका अपना
                     (अहसास)

http://authorehsaas.blogspot.com/


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