मुझे बेचारा न कहो
शायद मजबूरी मेरी किस्मत की हो-
हाथ बढ़ाकर थामों तो जरा
शायद तस्वीर मेरी भी अच्छी हो-
जिस वक्त किताब
मेरे हाथों में हो
तब ढ़ो रहा मैं
परिवार का बोझ क्यों-
देखो मेरे भी बचपन
को
कौन समझेगा लड़कपन को-
दुःख नही रोष व्यक्त करता हूँ समाज को
क्यों ढ़ाते हो जुल्म मारकर मेरे हक को-
नहीं
मांगता मैं तुमसे कुछ
फिर क्यों
हरते हो मेरा सुख-
कौन बताएगा
मुझे, कौन दिखाएगा मुझे
कहां जा रहा
हूं मै, कौन समझाएगा मुझे-
वो मंजिल भी
कहीं दूर है
पता नहीं किस
डगर है
किस नगर है-
जा रहा हूं वस
बचपन की डगर
थामे हाथों में कमजोर सी डोर
चल रहा हूं बस अपनी मंजिल की ओर-
-आपका
अपना
(अहसास)
http://authorehsaas.blogspot.com/

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